सोमवार, 24 मार्च 2014

मिथिला के किसान

पूर्णिया| आज जहां आम लोग गांवों को छोड़ महानगरों की ओर भाग रहे हैं वहां कुछ लोगों को अपनी जन्मभूमि से ऐसा लगाव होता है कि महानगरीय जीवन छोड़ अपने गांव की माटी से जुड़ने चले आते हैं। यही नहीं, वे कुछ ही समय में अपनी जीतोड़ मेहनत से गांव के नामी किसान के रूप में उभरते हैं। कुछ ऐसा ही कर दिखाया है बिहार के पूर्णिया जिले के चनका गांव निवासी गिरीन्द्र नाथ झा ने। 

दिल्ली विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त गिरीन्द्र झा बताते हैं कि उनके मन में एक वर्ष पूर्व ख्याल आया और उसे अमलीजामा पहनाने के लिए दिल्ली-कानपुर के महानगरीय जीवन और पत्रकार की नौकरी छोड़कर गांव में आकर हल थाम लिया। जिन खेतों में पहले केवल धान और गेहूं उगता था, वहां उन्होंने प्लाइवुड के लिए लकड़ी उपजाने की योजना बनाई। यही नहीं, जमीन की उर्वरा शक्ति बनी रहे इसके लिए पारंपरिक खेती भी जारी रखी। 

उन्होंने बताया कि प्रारंभ में बड़े पैमाने पर वैज्ञानिक तरीके से कदंब के पौधे लगाने से शुरुआत की। दो पौधों के बीच की दूरी 20 फीट रखी। इसके अलावा इन खेतों में गेहूं, धान और मक्के की भी खेती करते रहे। बकौल गिरीन्द्र, "कदंब का पेड़ पर्यावरण के लिए तो महत्वपूर्ण होता ही है साथ ही यह तेजी से बढ़ता है। यह छह से आठ वर्षो में पूरा आकार ले लेता है। इसकी पत्तियां भी जमीन को उपजाऊ बनाती हैं।" 

उल्लेखनीय है कि कदंब के फूलों से एक इत्र बनाया जाता है, जबकि इसके बीजों से निकला तेल खाने और दीपक जलाने के काम आता है। इसके फल के रस से बच्चों का हाजमा ठीक रहता है जबकि इसकी पत्तियों के रस को अल्सर तथा जख्म ठीक करने के काम में लिया जाता है। आयुर्वेद में इसकी लकड़ी से बुखार दूर करने की दवा बनाने का उल्लेख मिलता है। 

गिरीन्द्र बताते हैं कि यह पौधा 10 से 12 वर्षो के अंदर प्लाईवुड कारखाने के लिए तैयार हो जाता है। सामाजिक वानिकी में प्रमुख स्थान रखने वाले इस पेड़ के प्रति एकड़ क्षेत्र में 100 से ज्यादा पौधे लगाए जा सकते हैं। एक पेड़ से 12,000 रुपये तक की आमदनी हो सकती है। 

गिरीन्द्र न केवल खुद बल्कि आसपास के ग्रामीणों को भी पौधरोपण के लिए जागरूक कर रहे हैं और उनके आर्थिक लाभ बता रहे हैं। जहां पिछले कई वर्षो से खेती नहीं हो पा रही थी, वहां चनका गांव तथा आसपास के किसान अब पौधरोपण कर रहे हैं। चनका गांव निवासी किसान राजेश बताते हैं कि सागवान का एक पौधा लगाने में 80 से 100 रुपये का खर्च आता है और यह 13 वर्ष में तैयार हो जाता है। इसके एक तैयार पेड़ से 25 हजार रुपये तक की आमदनी होती है। 

उन्होंने गिरीन्द्र की तारीफ में कहा, "गिरीन्द्र के गांव में वापस आने से न केवल हम किसानों को सरकारी कार्यक्रमों का पता लग रहा है बल्कि नई कृषि पद्धति की भी जानकारी मिल रही है।" गिरीन्द्र बताते हैं कि कदंब की लड़की से पेंसिल, माचिस की तीलियां, खेलों के सामान की पैकेजिंग के अलावा प्लाईवुड तैयार होता है। असम और बंगाल की तर्ज पर बिहार में भी अब प्लाईवुड कारखाने खोले जा रहे हैं।

Mukesh Jha

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